शेयर बाजार में गिरावट के बीच बैंकों और आयातकों की ओर से डॉलर की मांग बढ़ने के कारण फारेक्स यानी अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय में आज डॉलर की तुलना में रपया 89 पैसे की गिरावट के साथ 65 रपये प्रति डालर के निम्नतम स्तर पर आ गया.
रुपये की कीमत में लगातार इतनी बड़ी गिरावट कभी नहीं हुई.
फारेक्स बाजार के विश्लेषकों ने बताया कि अन्य मुद्राओं की तुलना में डॉलर की मजबूती से भी रपये की धारणा कमजोर हुई.
फारेक्स बाजार में कल के कारोबार के दौरान डॉलर की तुलना में रपया 64.11 रपये प्रति डालर पर बंद हुआ था, जो आज के शुरआती कारोबार में 89 पैसे की और गिरावट के साथ 65 रपये प्रति डॉलर पर आ गया.
बंबई शेयर बाजार का प्रमुख सूचकांक बीएससी-30 भी आज के शुरआती कारोबार में 76 अंक यानी 0.42 फीसद की गिरावट के साथ 17,829.91 अंक पर आ गया.
सवाल है कि क्यों रुपये और सेंसेक्स में गिरावट जारी है और क्या बाज़ार का यूपीए सरकार से भरोसा उठ गया है? सवाल यह भी है कि क्या देश 1991 के आर्थिक मंदी के दौर की ओर बढ़ रहा है?
गिरते रुपये का असर
रुपये की हालत खराब है और आज फिर एक डॉलर 65 रुपये से ऊपर चला गया. इससे भी ज्यादा खतरनाक खबर ये है कि जर्मनी के एक बैंक (Deutsche) ने कहा है कि डॉलर एक महीने में 70 रुपये के पार जा सकता है. इसका सबसे ज्यादा असर हुआ है देश में कमाई के मौकों पर- यानी नौकरी और कारोबार पर.
एबीपी न्यूज लगातार दिखा रहा है कि कैसे देश का हाल हो रहा है बेहाल.
सबसे पहले बात उद्योगों में नौकरियों की. सूरत के टेक्सटाइल उद्योग में टेक्सटाइल इंजीनियरों को भी नौकरी नहीं मिल रही है. हालत ये है कि डिग्री लेकर भी लोग लोन लेकर कारोबार करने को मजबूर हैं.
सूरत के भागल इलाके में रहने वाले हनी चोखावाला देश के उन युवाओं में शामिल हैं जिन्होंने सूरत के मशहूर टेक्सटाइल उद्योग में अपना भविष्य संवारने का सपना देखा था. टेक्सटाइल इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद जब वो नौकरी करने पहुंचे तो उनके सपने चूर हो गए. पढ़ाई के मुताबिक नौकरी नहीं मिली तो हनी चोखावाला ने लोन लेकर टेक्सटाइल से जुड़ा कारोबार शुरू कर दिया है लेकिन वहां भी आमदनी निवेश के मुताबिक नहीं हो पा रही है. हनी जैसे युवा मानते हैं कि टेक्सटाइल जैसे उद्योगों की कमर टूट चुकी है.
उदारीकरण के दौर में छोटे शहरों में बड़ी कंपनियों का जाल बिछ जाने का जो दावा किया गया था वो भी पूरा नहीं हुआ. ऐसे में छोटे शहरों में बड़ी डिग्रियां भी अच्छी नौकरियां नहीं दिलवा पा रही हैं.
लखनऊ की रहनेवाली संजीवनी ने साल 2007 में लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन के बाद सोचा की एमबीए करके उन्हें अच्छी नौकरी मिल जाएकी. एमबीए के लिए उन्होंने 4 लाख रुपये का एडुकेशन लोन भी लिया और पुणे से ह्यूमन रिसोर्स में एमबीए पूरा कर लिया वो भी गोल्ड मेडल के साथ, लेकिन अब हालत ये है कि महीनों नौकरी के लिए तरसने के बाद कम तनख्वाह पर समझौता करना पड़ा.
कैंपस में अच्छी कंपनियां नौकरी देने ही नहीं आईं और अपने शहर में छोटी सी नौकरी के बाद संजीवनी को लगता है कि इससे बेहतर होता कि उन्होंने बैंकिंग की तैयारी की होती.